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बगैर किसी चेतावनी के पड़ने वाले दिल का दौरा के बारे में हार्ट विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। पर्यावरण मंत्री अनिल दवे की 60 साल में और बॉलीवुड अदाकारा रीमा लागू की 59 साल की उम्र में अचानक मृत्यु होने से, दवे को हृदय से जुड़ी गंभीर समस्या होने के बारे में कोई संकेत नहीं था। उन्होंने देर रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ एक बैठक की थी। वहीं, रीमा के परिवार ने बताया कि उनके साथ स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या नजर नहीं आ रही थी।

हार्ट विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीयों में जीवन प्रत्याशा बढ़ी है जबकि युवावस्था में ही लोगों को दिल के दौरे पड़ रहे हैं। एम्स के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ संदीप मिश्रा ने बताया कि 55 साल की आयु के नीचे करीब 50 फीसदी भारतीय दिल का दौरा पड़ने से ग्रसित हैं जबकि 25 फीसदी दिल का दौरा पड़ने का मामला 40 साल से नीचे के उम्र में है। इसलिए यह आत्मावलोकन करने और जीवनशैली में आवश्यक बदलाव की मांग करता है।

चिकित्सकों ने चेतावनी दी है कि व्यायाम नहीं करने के चलते मधुमेह, मोटापा और उच्च रव्तचाप जैसे रोग होते हैं जो दिल का दौरा पड़ने की वजह हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि तंबाकू ने इस जोखिम को और बढ़ाया है। ड़ॉ मिश्रा ने कहा कि हम संप्रामक रोगों को काबू कर मृत्यु दर में कमी लाने में सक्षम रहे हैं लेकिन जीवनशैली से जुड़ी मौतें बढ़ रही हैं।

सर गंगा राम अस्पताल के हृदय रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ जेपीएस साहने के मुताबिक, भारत में जिन लोगों को हृदय रोग है या जिन्हें दिल का दौरा पड़ा है, वे पश्चिमी देशों में इसी तरह की समस्या वाले लोगों की तुलना में आठ से 10 साल छोटे हैं। उन्होंने कहा कि 50 फीसदी मामलों में बगैर चेतावनी के दिल का दौरा पड़ता है।

चिकित्सकों ने कहा कि भारत में समय से पहले दिल का दौरा पड़ने की एक अहम वजह `हाइपरकोलेस्टेरोलेमिया' है जो एक आनुवांशिक स्थिति है। यह उच्च कॉलेस्टेरोल की वजह है। व्यायाम और एक अच्छा आहार और तनाव नहीं लेना या धूम्रपान नहीं करना, कुछ ऐसी चीजें हैं जो हृदय से जुड़ी समस्याओं से बचा सकती हैं। 

नियमित व्यायाम से आपके शरीर में शप्रियता लाने के साथ-साथ अतिरिव्त बसा को दूर करके वजन को भी घटाया जा सकता है। व्यायाम से अस्थिमज्जा में जमा हो रहे वसा को घटाने में कारगर है और इससे हड्डी की गुणवत्ता कुछ सप्ताह में ही सुधारी जा सकती है।

 एक ताजा शोध में बताया गया है कि मोटापे के शिकार व्यव्तियों में हड्डी की गुणवत्ता बेहद खराब होती है। वे अपने दुर्बल समकक्षों की तुलना में अपनी हड्डियों को व्यायाम से ज्यादा स्वस्थ रख सकते हैं। अमेरिका के उत्तरी कैरोलिना विश्वविद्यालय की सहायक प्रोफेसर माया स्टेनर ने कहा कि इस शोध के प्रमुख निष्कर्ष में से एक यह है कि व्यायाम न केवल समूचे शरीर के लिए, बल्कि हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है।

 स्टेनर ने कहा कि बहुत ही थोड़े समय में हमने देखा कि दौड़ने वाले चूहों की हड्डियां बहुत ही स्वस्थ थीं। हालांकि, चूहों पर किया गया शोध सीधे तौर पर मानव स्थितियों पर लागू नहीं होता, लेकिन जो स्टेम कोशिकाएं चूहों में हड्डी बनाती हैं, वह ठीक मानव में हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं की तरह ही होती हैं। स्टेनर ने बताया कि व्यायाम से हड्डी ज्यादा मजबूत होती है। 

क्या आप जानते हैं की आपके घर में रखे मिट्टी के बर्तन भी आपका भाग्य चमका सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार मिट्टी के बर्तनों को बहुत पवित्र माना गया है। पहले मिट्टी के बने बर्तनों में खाना खाया जाता था। घर में रखें मिट्टी के बर्तन एक तरफ जहां आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाते हैं बल्कि इनके घर या ऑफिस में होने से गुडलक, धन-वैभव, सफलता सब कुछ हासिल किया जा सकता है। पूजा घर से लेकर विवाह के मौके पर पूजा के लिए इस्तेमाल किए जानें वाले सभी बर्तन मिट्टी के होते हैं।

घर में इस्तेमाल होने वाले बर्तन हमारे जीवन स्तर को इंगित करते हैं। इसी कारण इन दिनों सुंदर डिजाइन वाले बर्तनों का चलन बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। इसी चलन के कारण कई घरों में पुराने या टूटे-फूटे बर्तनों को संभालकर स्टोर रूम में रख दिया जाता है, जो कि वास्तु की दृष्टि से अशुभ है तथा इसे वास्तु विज्ञान में एक दोष की भांति देखा जाता है। टूटे-फूटे बर्तन दरिद्रता की ओर संकेत करते हैं तथा इन्हें घर में जगह देने से घर में दरिद्रता बढ़ती है और कई तरह की आर्थिक हानि भी हो सकती है।

राहू ग्रह अशुभता का परम सूचक माना जाता है। टूटे-फूटे तथा खंडित चीनी मिट्टी के बर्तन राहू का प्रतीक हैं। ज्योतिषशास्त्र की लाल किताब में हमेशा से ही इस बात पर जोर दिया जाता है कि घरों में टूटे-फूटे बर्तन नहीं रखने चाहिए, न ही कभी ऐसे बर्तनों में भोजन करना चाहिए। जो व्यक्ति टूटे-फूटे बर्तनों में खाना खाता है उससे धन की देवी लक्ष्मी रूठ जाती हैं और उसके घर में अलक्ष्मी अर्थात दरिद्रता का निवास होता है। ऐसा होने पर कई प्रकार के नुकसान का सामना करना पड़ता है।

आपको अपने घर से सभी टूटे-फूटे, खंडित, दरार पड़े हुए तथा बेकार बर्तनों को हटा देना चाहिए। इससे वास्तु दोष का परिहार हो जाता है तथा घर में लक्ष्मी पुनः वास करती हैं। खंडित बर्तन में खाना खाने से हमारी जीवनशैली नकारात्मक बनती है। जैसे बर्तनों में हम भोजन करते हैं हमारा स्वभाव और स्वास्थ्य भी वैसा ही बन जाता है। इसी वजह से अच्छे और साफ बर्तनों में भोजन करें। इससे आपके विचार भी शुद्ध होंगे और सकारात्मक ऊर्जा का शुभ प्रभाव आप पर पड़ेगा और आप सफलता के शिखर पर पहुचने में सफल होंगे।

01-वास्तुशास्त्र में बताया गया है की अगर घर की उत्तर पूर्व दिशा में मिटटी के बर्तन में पानी भरकर रखा जाये तो घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश नहीं होता है. इसके अलावा स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी यह फायदेमंद होता है. वास्तुशास्त्र में बताया गया है है तनाव या फिर किसी मानसिक समस्या का शिकार होने पर घड़े में रखा पानी पीने से तनाव दूर हो जाता है | अथवा घर में उत्तर पूर्व दिशा में मिटटी के घड़े में पानी भरकर रखें इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। सेहत के लिहाज से देखा जाए तो और भी फायदेमंद है। वास्तु के अनुसार अगर कोई तनाव या फिर किसी मानसिक समस्या का शिकार है तो उसे घड़े में रखा पानी पीना चाहिए।

02— आप ये भी जान ले की घर में पूजा के लिए भगवान की मूर्ति अगर मिट्टी के लाएंगो तो इससे आपके घर में हमेशा बरकत रहेगी क्यों की मिटटी को शुद्ध माना जाता है यही नहीं घर में मिट्टी के सजावटी बर्तन जैसे कटोरी, फ्लावर पॉट को दक्षिण-पूर्व दिशा में रख सकते हैं। कहते हैं इससे घर में सौभाग्य तो आता है।

03 .– अमावस्या के दिन मिट्टी के बर्तन में काले तिल और पानी लें। दक्षिण की तरफ बैठकर इस मंत्र का जाप करें ‘ओम पित्र देवाय नमः ओम शांति भवाह’। ऐसा करने से आपको फायदा होगा। इसके अलावा आप अमावस्या के दिन गाय या किसी गरीब को खाना खिलाएं।

04 .– भारतीय सभ्यता में प्राचीन काल से ही मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने की प्रथा रही है |आज भले ही साइंस ने कितनी भी तरक्की क्यों न कर ली हो, लेकिन स्वास्थ्य के नजरिए से देखा जाए तो मिट्टी की हांडी में खाना पकाना आज के प्रेशर कुकर की तुलना में कई गुना ज्यादा लाभकारी सिद्ध होता है |

05 .– घर में समृद्धि लाने हेतु घर के उत्तरपश्चिम के कोण (वायव्य कोण) में सुन्दर से मिट्टी के बर्तन में कुछ सोने-चांदी के सिक्के, लाल कपड़े में बांध कर रखें। फिर बर्तन को गेहूं या चावल से भर दें। ऐसा करने से घर में धन का अभाव नहीं रहेगा।

06 .– भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष भरणी नक्षत्र के दिन चार घड़ों में पानी भरकर किसी एकान्त कमरे में रख दें। अगले दिन जिस घड़े का पानी कुछ कम हो उसे अन्न से भरकर प्रतिदिन विधिवत पूजन करते रहें। शेष घड़ों के पानी को घर, आँगन, खेत आदि में छिड़क दें। अन्नपूर्णा देवी सदैव प्रसन्न रहेगीं।

पंडित दयानंद शास्त्री

उम्र कोई भी हो, मजबूत हडि्डयां स्वस्थ शरीर की जरूरत होती हैं । हमारी हड्डियां कैल्शियम के अलावा कई तरह के मिनरल से मिलकर बनी होती हैं। अनियमित जीवनशैली की वजह से या फिर बढ़ती उम्र में ये मिनरल खत्म होने लगते हैं। हड्डियां घिसने और कमजोर होने लगती हैं। इसे मजबूती प्रदान करने के लिए कुछ जरूरी उपाय करते रहने चाहिए । क्‍योंकि इनके कमजोर होने से धीरे-धीरे मरीज काम करने में असमर्थ होता जाता है। मामूली चोट लगने से भी उसे फ्रैक्चर होने की संभावना बढ़ जाती है। 

वास्‍तव में देखें तो हार्मोनल बैलेंस बिगड़ने, असंतुलित भोजन और बढ़ती उम्र के कारण भी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। लेकिन सही देखभाल की जाए, तो हड्डियों को कमजोर होने से बचाया जा सकता है।द नवजात बच्चों से लेकर बढ़ते बच्चों में कैल्शियम की जरूरत अधिक होती है। मजबूत हड्डियों के लिए विटामिन-डी की जरूरत होती है। इसकी कमी से बच्चों में रिकेट्स और स्कर्वी जैसे रोग हो सकते हैं। छोटे बच्चों के हाथ-पैरों में टेढ़ापन और बड़ा माथा होना विटामिन डी की कमी को ही दर्शाता है। सूर्य की रोशनी विटामिन-डी का सबसे बेहतर स्रोत है। बच्चों को चारदीवारी में रखने की बजाय उन्हें बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करें। माता पिता को चाहिए कि वे कम से कम जंक फूड बच्चों को दें और उन्हें दूध जरूर पिलाएं।
इसे और बेहतर तरीके से समझें -
कैल्सियम:

कैल्सियम शरीर में सब से अधिक मात्रा में पाया जाने वाला तत्त्व है. शरीर के 99% कैल्सियम का संचय हड्डियों में होता है जबकि शरीर की विभिन्न क्रियाओं में केवल 1% ही इस का उपयोग किया जाता है. हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्सियम का अच्छा स्रोत होती हैं. इन के अलावा मछलियां, साबूत अनाज, केले, ब्रैड, पास्ता सोया मिल्क, टोफू और बादाम भी कैल्सियम के अच्छे स्रोत हैं.

विटामिन डी:
विटामिन डी की कमी से हड्डियां कमजोर और मुलायम हो जाती हैं. सूर्य का प्रकाश विटामिन डी का सब से अच्छा स्रोत है. सूर्य की रोशनी के अलावा दूध, अंडा, चिकन, मछली आदि भी विटामिन डी के अच्छे स्रोत हैं.

पोटैशियम:
जो लोग पर्याप्त मात्रा में पोटैशियम का सेवन करते हैं उन की हड्डियों की सेहत बेहतर रहती है. शकरकंद, आलू छिलके सहित, दही और केले पोटैशियम के अच्छे स्रोत हैं.

मैग्नीशियम:
पालक, चुकंदर, टमाटर, आलू, शकरकंद, किशमिश आदि खाइए, क्योंकि इन में भरपूर मात्रा में मैग्नीशियम पाया जाता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाता है.

प्रोटीन:
प्रोटीन शरीर का निर्माण करने वाले तत्त्वों में सब से महत्त्वपूर्ण है. यह हड्डियों को मजबूत रखता है. प्रोटीन हड्डियों के लिए ही नहीं उतकों और लिंगामैंट्स के लिए भी बेहद जरूरी है. मेनोपौज के बाद जिन महिलाओं के भोजन में प्रोटीन की मात्रा कम होती है उन में औस्टियोपोरोसिस का खतरा 30% तक बढ़ जाता है.

विटामिन सी और के:
हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन सी और के भी बहुत आवश्यक हैं. लालमिर्च, हरीमिर्च, संतरा, अंगूर, ब्रोकली, स्ट्राबैरी, अंकुरित अनाज, पपीता और पाइनऐप्पल विटामिन सी के अच्छे स्रोत हैं. शलगम, पालक, सरसों और मैथी में भी विटामिन के भरपूर मात्रा में पाया जाता है.

अत: इन सभी का अपनी दिनचर्या में ठीक ढंग से उपयोग करते हुए हड्डियों की समस्‍या से लम्‍बे समय तक निजात पाइ्र जा सकती है ।

हर किसी को पैरों में तेज दर्द होना अब आम बात होती जा रही है । यह क्‍यों होता है, यह एक बड़ा प्रश्‍न सभी का हो सकता है तो जान लें कि मांसपेशियों में सिकुडऩ, मांसपेशियों की थकान, ज्यादा चलना, मांसपेशियों में तनाव पैदा करने वाला व्यायाम, घुटनों, कूल्हों और पैरों में सही रक्त प्रवाह न होना, पानी की कमी, सही डाइट न लेना, खाने में कैल्शियम और पोटाशियम जैसे मिनरल्स और विटामिन्स की कमी होने से पैरों में निरंतर दर्द रहने लगता है।

पैरों में दर्द होना तो आम बात है। महिलाओं में खाना बनाने, घर की सफाई करने, कपड़े धोने के दौरान लंबे समय तक पैरों को मोड़े रखने और कामकाजी महिलाओं द्वारा बस में खड़े होकर लंबी दूरी तय करने जैसे दैनिक कामों का असर भी इस दर्द के रूप में सामने आ सकता है। वहीं ऊंची एड़ी के फुटवियर को लगातार लाइफ स्टाइल का हिस्सा बनाना दर्द की वजह बनता है।

कारण भले ही कोई भी रहे पर लगातार रहने वाले पैरों के इस दर्द को नॉर्मल समझ कर इसको एवॉयड करना ठीक नहीं क्योंकि यह अनदेखी आपको बड़ी पीड़ा का सामना करने पर भी मजबूर कर सकती है। इससे पहले कि पैरों का दर्द आपको हर काम से महरूम कर बिस्तर पर ले आए, इस पर जल्द ही काबू पा लेना बेहतर होगा।

यूं तो दर्द से राहत पाने के लिए डॉक्टर को दिखा कर दवा अवश्य लें परंतु अपने रोजमर्रा के जीवन में बदलाव लाकर भी आप पैरों के दर्द से निजात पा सकती हैं।

अपनी पानी पीने की आदत पर ध्यान दें और पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं क्योंकि यह मांसपेशियों की सिकुडऩ और पैरों के दर्द को कम करता है। यदि आप जिम जाती हैं या एक्सरसाइज और वॉक करती हैं तो उससे पहले भी सही मात्रा में पानी पीएं। यह शरीर को पूरी तरह हाइड्रेट रखता है।

फलों के जूस का सेवन करें, संतुलित और पौष्टिक भोजन लें। हरी सब्जियां, गाजर, केले, मेवे, अंकुरित मूंग, सेब, संतरा और अंगूर आदि को अपने खाने में शामिल करें। दूध से बने प्रोडक्ट्स ज्यादा लें, पनीर, दही के अलावा सोयाबीन और सलाद वगैरह से भरपूर विटामिन मिलेंगे। अपने खाने में ऐसी चीजों की मात्रा बढ़ाएं जिनमें कैल्शियम और पोटाशियम ज्यादा मात्रा में हो।

दुनिया भर में सबसे ज्यादा लोग खानपान की विकृति की वजह से बीमार हो रहे हैं। खानपान की इस विकृति का नाम है जंकफूड और इससे पैदा हुई महामारी का नाम मोटापा है। स्थिति तब और भी ज्यादा गंभीर हो जाती है, जब हमें पता चलता है कि इनमें चैथाई तो बच्चे हैं। दिल्ली के स्कूली बच्चों के भोजन में सतर प्रतिशत जंक फूड है। और इसी जंक फूड से भारतीय महिलाएं मोटापा एवं अन्य घातक बीमारियों की शिकार हो रही है।

भारत में सबसे बड़ा जंक फूड समोसा, चिप्स और गोलगप्पे हैं जो गली-कूचे से लेकर बड़ी-बड़ी दुकानों में मिलते हैं। सरकार का प्लान चिप्स और समोसे पर जंक फूड की लेबलिंग करने का है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, ऐसे हर खाद्य पदार्थ को जंक फूड का लेबल देगा जिसमें मानक से ज्यादा नमक, शक्कर या चर्बी होती है। इसके अलावा स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों से इनकी पहचान अलग की जाएगी। हमारी दृष्टि में प्राधिकरण की यह अच्छी पहल है ये और ऐसे अन्य प्रभावी कदम उठाये जाने की आवश्यकता है। जंकफूड के खिलाफ एक सशक्त आन्दोलन खड़ा किया जाना चाहिए।

दिल्ली के स्कूली बच्चों के भोजन में सतर प्रतिशत जंक फूड है। वडा पाव, समोसा, पिज्जा, बर्गर, रोल, चिली, फैंच फ्राइज-ये सब किसे नहीं पसंद? लेकिन इनका हमारे शरीर पर होने वाला घातक परिणाम भी कम नहीं हैं। बच्चों के मामले में तो यह और भी नुकसानदायक इसलिए है कि जंक फूड का ज्यादा इस्तेमाल हमारे दिमाग की क्षमता को कम करता है और अनेक बीमारियों को आमंत्रित करता है। हाल में चूहों पर किए गए रिसर्च से पता चला कि लगातार एक सप्ताह तक फास्ट फूड खाने से उनकी दिमागी क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, किसी व्यक्ति के हर रोज के आहार में ज्यादा से ज्यादा 2-2.5 ग्राम ट्रांसफैट हो सकता है। 30 ग्राम प्राकृतिक चीनी। 20 ग्राम अतिरिक्त चीनी और नमक की मात्रा पांच ग्राम से भी कम। जबकि हमारे देश की स्थिति यह है कि 40 फीसदी से अधिक आबादी रोजाना 10 ग्राम से अधिक नमक का इस्तेमाल अपने भोजन में करती है। नमक के इस्तेमाल से रक्तचाप और अन्य घातक बीमारियों के खतरे का सीधा संबंध है। विकसित देशों तो इस मामले में जागरूक हो चुके हैं और वे कैंसर, दिल की बीमारियों, डायबीटीज और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों पर रोकथाम के लिए तत्पर हैं। कारण यह है कि इन मामलों में उन देशों की सरकारों की जिम्मेदारी होने के नाते उन्हें तमाम मरीजों के मेडिकल बिलों का भुगतान करना पड़ता है लेकिन हमारे देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की क्या हालत है, यह किसी से नहीं छिपा।

पिज्जा बर्गर से तो लोगों को डरा सकते हैं, समोसे, चिप्स, गोलगप्पे से कैसे डराएंगे? क्योंकि अक्सर जिन चीजों पर नियंत्रण किया जाता है, दबाने की कोशिश की जाती है, वे ज्यादा प्रचलन में आते हैं। दरअसल इसके लिए सरकार को एक समग्र खाद्य नीति बनाने की जरूरत है। इसका मतलब यह नहीं कि प्राधिकरण का यह कदम बेकार है। प्राधिकरण का यह कदम उस समग्र खाद्य नीति की तरफ बढ़ाया हुआ पहला कदम भी हो सकता है। स्कूलों में बच्चों तक स्वास्थ्यवर्धक भोजन ही पहुंचे, इसका स्थायी इंतजाम हो।

आधुनिक बीमारियों, दुःख एवं तनाव का बड़ा कारण हमारा खानपान है। कहावत है ‘‘जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन।’’ भोजन तीन प्रकार का होता है- सात्विक, तामसिक और राजसिक। सात्विक भोजन जहां मन को शुद्ध करता है, वहां तामसिक और राजसिक भोजन मन में एक प्रकार की उत्तेजना पैदा करते हैं, जिससे शरीर की ऊर्जा का अपव्यय होता है। इसलिए आहार-शास्त्र में सात्विक भोजन की सिफारिश की गई है और तामसिक तथा राजसिक भोजन से बचने का आग्रह किया गया है। जंकफूड तो तामसिक भोजन ही है और इसे व्यावसायिक हितों के तहत षडयंत्रपूर्वक देश में प्रचलित किया जाता रहा है।

हमारे देश में शुद्ध एवं सात्विक आहार की समृद्ध परम्परा एवं प्रचलन रहा है। लेकिन बाजारवाद एवं विदेशी कम्पनियों ने जंकफूड को महिमामंडित करके जनजीवन में प्रतिष्ठापित किया गया है। जबकि हमारे यहां तो तरह-तरह के तनाव एवं बीमारियों को दूर करने के लिए गीता में शुद्ध आहार की बात कही गयी है। अर्थात् हमें सात्विक भोजन करना चाहिए और पूरी निद्रा लेनी चाहिए। जंकफूड़ मनुष्य की वृत्तियों को उत्तेजित करता है और निद्रा का पूरा न होना मन को बेचैन करता है। भोजन का संयम न हो तो शरीर स्वस्थ नहीं रह सकता। भोजन में कम खाने एवं सात्विक खाद्य का महत्व है। कहा गया है कि जितने आदमी भूख से मरते हैं, उससे अधिक ज्यादा खाने एवं विकृत खानपान से मरते हैं। आहार का संतुलित एवं संयमित होना जरूरी है।
वडा पाव, समोशा, पिज्जा,बर्गर, रोल, चैमिन,चिली, फैंच फ्राइ और कोलड्रिंक आदि ने लोगों के शुद्ध एवं स्वास्थ्यवर्द्धक खानपान पर कब्जा कर लिया है। आज लोग पौष्टिक आहार को कम फास्ट फूड या जंक फूड को ज्यादा तवज्जों देने लगे हैं। लेकिन इस जंक फूड से हमारी जिंदगी को कितना नुकसान पहुंच रहा है आपको अंदाजा नहीं है।

जंक फूड का सेवन इतना नुकसानदेह है कि निरंतर इसके सेवन से शरीर शिथिल होता है, खुद को थका हुआ महसूस करते हैं। आवश्यक पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट की कमी की वजह से फास्ट फूड ऊर्जा के स्तर को कम कर देता है। जंक फूड का लगातार सेवन टीनेजर्स में डिप्रेशन का कारण बनता है। बढती उम्र में बच्चों में कई तरह के बायोलॉजिकल बदलाव आने लगते हैं। जंक फूड जैसे चाऊमिन, पिज्जां, बर्गर, रोल खाना बढ़ते बच्चों के लिए एक समस्या बन रहा है और वे डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। मैदे और तेल से बने ये जंक फूड पाचन क्रिया को भी प्रभावित करते हैं। इससे कब्ज की समस्या उत्पन्न होती है। इन खानों में फाइबर्स की कमी होने की वजह से भी ये खाद्य पदार्थ पचने में दिक्कत करते हैं। ज्यादा से ज्यादा फास्ट फूड का सेवन करने वाले लोगों में 80 फीसदी दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इस तरह के आहार में ज्यादा फैट होता है जो कोलेस्ट्रॉल के उच्च स्तर में भी योगदान देता है। वसा से भरपूर खाद्य पदार्थ हृदय, रक्त वाहिकाओं, जिगर जैसे कई बीमारियों का कारण हैं। कैफीन युक्त खाद्य पदार्थ जैसे कॉफी, चाय, कोला और चॉकलेट, सफेद आटा, नमक-ये कुछ ऐसी चीजें है जो तनाव को बढ़ाने में मदद करती है।


ललित गर्ग

 

 

पहले की अपेक्षा आज का समय पूरी तरह बदल चुका है । क्‍यों कि आज आपका समय चुराने के इतने साधान हैं कि आपको मालूम ही नहीं चलता है कि कब आपका समय आपके हाथ से चला गया, वह भी अनियमित जीवनशैली अपनाते हुए । यही कारण है कि जीवन शैली की अनियमितता के कारण लोग अपनी सेहत का सही प्रकार से ख्याल नहीं रख पाते. जिसके कारण उन्हें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

आज हम आप को साइनस के लक्षण और उपचार के बारे में बताने जा रहे हैं जिससे अधिकतर लोग परेशान रहते हैं. जो आम सर्दी के रूप में शुरू होती है और फिर एक बैक्टीरियल, वायरल या फंगल संक्रमण के साथ बढ़ जाती है। साइनस की बीमारी को लेकर लखनऊ में नाक कान गला रोग विशेषज्ञ ड़ा- विवेक वर्मा से खास बातचीत में उन्होने बताया कि साइनस नाक में होने वाला एक रोग है. इस रोग में नाक की हड्डी भी बढ़ जाती है या तिरछी हो जाती है. जिसकी वजह से सांस लेने में परेशानी होती है. जो व्यक्ति इस रोग से ग्रसित होता है उसे ठण्डी हवा, धूल, धुआं आदि में परेशानी महसूस होती है.

साइनस मानव शरीर की खोपड़ी मे हवा भरी हुई कैविटी होती है, जो हमारे सिर को हल्कापन व श्वास वाली हवा लाने मे मद्द करती है. श्वास लेने में अंदर आने वाली हवा इस थैली से होकर फेफड़ों तक जाती है. इस थैली में हवा के साथ आई गंदगी यानि धूल और दूसरी तरह की गंदगियों को रोकती है. जब व्यकित के साइनस का मार्ग रूक जाता है, तो बलगम निकले का मार्ग भी रूक जाता है. जिससे साइनोसाइटिस नामक बीमारी होती है. साइनस के संक्रमण होने पर इसकी झिल्ली में सूजन आ जाती है. जिसके कारण झिल्ली में जो हवा भरी होती है उसमें मवाद या बलगम आदि ङर जाता है. जिससे व्यकित के साइनस बंद हो जाते हैं. और मरीज को परेशानी होनी लगती है.

इस बीमारी का मुख्य कारण झिल्ली में सूजन का आ जाना, साथ ही यह सूजन भी निम्न कारणों से आ सकती है बैक्टीरिया, फंगल संक्रमण, या फिर नाक की हड्डी का ढ़ेडा होना. उन्होने बताया कि इसके लक्षण आप इस बीमारी को आसानी से पहचान सकते हैं, सिर का दर्द होना, बुखार रहना, नाक से कफ निकलना और बहना, खांसी या कफ जमना, दांत में दर्द रहना, नाक से सफेद हरा या फिर पीला कफ निकलना. चेहरे पर सूजन का आ जाना, कोई गंध न आना. साइनस की जगह दबाने पर दर्द का होना आदि इसके लक्षण हैं. आम तौर पर ये गंभीर बीमारी नही है लेकिन समय रहते इसका इलाज नही कराया गया तो मरीज को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.

डा. विवेक वर्मा के अनुसार मरीज को यह बीमारी है या नही इसके लिए सीटी स्कैन या एमआर आई के अलावा साइनस के अन्य कारणों को लेकर खून की जांच भी की जाती हैं. जिससे हमें बीमारी होने का ठोस कारण पता चल सके. ऐसे में सिटी स्कैन व एलर्जी टेस्ट आदि करवाकर यदि नाक की हड्डी एवं साइनस की बीमारी सामने आती है तो उस मरीज को घबराने की जरूरत नही है. आज कल इसका ऑपरेशन दूरबीन विधि से या फिर नाक की इंडोस्कोपिक साइनस सर्जरी करा सकते हैं. साइनस से ग्रसित व्यक्तियों को धुंए और धूल से बचना चाहिए. साथ ही साथ आप ऊबलते हुए पानी की भाप या सिकाई भी कर सकते हैं. इस दौरान पंखा और कूलर भी बंद कर लें. अगर समय रहते इसका इलाज नहीं कराया गया तो बाद में अस्थमा और दमा जैसे कई गंभीर रोग भी हो सकते हैं.

रवि श्रीवास्‍तव

आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में कब किसे ह्दय संबंधी रोग घेर लें, कुछ कहा नहीं जा सकता । काम का दवाब और जीवन शैली में आए परिर्वन का यह परिणाम है कि इन दिनों कब किसे कहां ह्दय घात आ जाए कुछ पता नहीं । ऐसे में यदि अपने ह्दय को दुरुस्‍त रखना है तो कुछ आयुर्वेद उपाय अपनाकर स्‍वयं के जीवन को लम्‍बे समय तक ह्दय की बिमारी से दूर रखा जा सकता है । अर्जुन-छाल ऐसा ही उपाय है जिसका कि उपयोग नियमित तौर पर करते हुए अपने कमजोर ह्दय को भी ताकत दी जा सकती है । डॉ. सुरेश चंद्र का तो यही कहना है ।

राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय चन्द्रावल (लखनऊ) के निदेशक आयुर्वेद डॉ. सुरेश चन्द्र ने बताया कि अर्जुन की छाल से बने काढे का सेवन हृदय रोगियों के लिए अत्यंत लाभप्रद है। यह हृदय धमनी काठिन्य (कोरोनरी हार्ट डिजीज) को ठीक करने के साथ-साथ यकृत विकार तथा हड्डियों को मजबूत करने में भी लाभप्रद साबित हुई है। ऐसे ही वे एक अन्‍य पौधे हरसिंगार के बारे में जानकारी देते हुए कहते हैं कि इसकी 11 पत्तियों का काढा बनाकर प्रतिदिन पिया जाय तो गृधसी (सियाटिका), जोड़ों के दर्द आदि वातव्याधियों को दूर करता है।

डॉ. सुरेश चंद्र के अलावा अन्‍य आयुर्वेदिक चिकित्‍सकों यहां तक कि होम्‍योपैथी एवं एलोपैथी के डॉक्‍टर्स भी यह मानते हैं कि अर्जुन छाल एक अचूक दवा के रूप में ह्दय रोगियों के लिए रामवाण सिद्ध हुई है । इस संबंध में अभी तक हुए अनुसंधान में यही कह रहे हैं । सच, हमारे आसपास लगे पौधे हमारे लिए कितने उपयोगी है यह इससे समझा जा सकता है ।

देखाजाए तो स्वास्थ्य संरक्षण की इस प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति ‘आयुर्वेद‘ को पुनर्जीवित करने हेतु आवश्यक है कि ऐसे औषधीय पौंधो का रोपण किया जाए जो स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए हर दृष्टि से लाभप्रद हैं। डॉ. शिवशंकर त्रिपाठी भी डॉ. सुरेश चन्द्र से सहमत नजर आते हैं, वे एक अन्‍य पौधे कचनार की छाल के बारे में बताते हैं कि इससे शरीर की ग्रन्थियों में होने वाली सूजन को दूर करने तथा अर्बुद (टयूमर) को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता है । वहीं वे यह भी बताते हैं कि वासा (अडूसा) की पत्तियों एवं फूलों का काढ़ा किसी भी प्रकार की खांसी को दूर करने में अत्यंत लाभकारी है।

इन दिनों अंगूर का मौसम चल रहा है। इस बार बाजार में उच्चतम गुणवत्ता के अंगूर आए हैं । आपको बता दें कि अंगूर सिर्फ खाने में ही स्वादिष्ट नहीं होते हैं, बल्कि सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं। इसमें कई तरह के पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर को सेहतमंद बनाए रखने में उपयोगी हैं। अंगूर में विटामिन, पोटेशियम, कैल्शियम, फास्फोरस, कार्बोहाइड्रेट और ग्लूकोज पर्याप्त मात्रा में होता है, जो शरीर में खून की वृद्धि करता है व कमजोरी को दूर करता है।

अंगूर में मौजूद शर्करा रक्त में आसानी से अवशोषित हो जाती है और थकान दूर कर शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है। साथ ही अंगूर शरीर में मौजूद विषैले तत्वों को आसानी से शरीर से बाहर निकाल देता है। अंगूर रक्त की क्षारीयता को भी संतुलित करता है। किसी कारणवश शरीर में अम्लता बढ़ जाए तो वह हानिकारक साबित होती है। ऐसा होने पर 20 से 30 ग्राम अंगूर खाएं।

अंगूर को रोजाना खाने से कैंसर, एपेंडिक्स, बच्चों में कमजोरी, मिर्गी, रक्त संबंधी विकार, आमाशय में घाव और कमजोरी में लाभ मिलता है। यदि किसी ने धतूरा खा लिया हो तो उसे दूध में अंगूर का सिरका मिलाकर दें। यह टायफॉइड, मानसिक परेशानी और पाचन की गड़बड़ी में भी लाभकारी होता है।

आज दिनों दिन डायबिटीक लोगों की संख्‍या में तेजी से इजाफा हो रहा है । कल तक ये अमीर देशों में होने वाली अमीरों की बिमारी कहलाती थी किंतु वर्तमान में भारत जैसे विकासशील देशों तथा बहुत गरीब देशों में भी तेजी से फेल रही है । इसका यदि कारण देखें तो सीधा है, वह है अनियमित दिनचर्या और खान-पान के कारण लोग डायबिटीज का शिकार हो रहे हैं। डायबिटीज का प्रमुख कारण मोटापा है।

डायबिटीज में खून में शुगर की मात्रा बढ जाती है। वैसे इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है परन्तु जीवनशैली में सुधार कर डायबिटीज से बचा जा सकता है। भारत में 61 मिलियन लोग मधुमेह से पीडि़त हैं। हर 10 सेकण्ड में मधुमेह के एक मरीज बढ़ते हैं। आंकड़ों के अनुसार 2030 तक भारत में डायबिटीज से पीडि़त मरीजों की संख्या 100 मिलियन हो जायेगी।

इस प्रकार भारत विश्व का सबसे ज्यादा डायबिटीज पीडि़त मरीजों वाला देश बन जायेगा।बलरामपुर अस्पताल के चिकित्सक डा. मनोज अग्रवाल ने बताया कि हाल ही में प्रकाशित एक अमेरिकन रिपोर्ट के मुताबिक केवल हप्ते में एक बार नाश्ता छोड़ने से टाइप-2 डायबिटीज होने की संभावना बढ़ जाती है।

डा. अग्रवाल ने बताया कि डायबीटीज खास तौर से दो तरह की होती है। पहली इंसुलिन आधारित डायबीटीज। इसमें इंसुलिन हॉर्मोन बनना पूरी तरह से बंद हो जाता है। ऐसे में शरीर में ग्लूकोज की बढ़ी हुई मात्रा को कंट्रोल करने के लिए इंसुलिन के इंजेक्शन की जरूरत होती है। इसके अलावा दूसरी है बिना इंसुलिन आधारित डायबीटीज। इसमें इंसुलिन कम मात्रा में बनता है या पैंक्रियाज सही से काम नहीं कर रहा होता है।

जीवनसाथी के साथ रोज शारीरिक सबंध बनाना कितना अच्‍छा होता है, हम हम सभी को जानना चाहिए । कई बार लोग यह सोचते हैं कि ऐसा करने से कहीं उनके स्‍वास्‍थ्‍य पर कुछ बुरा असर न पड़े, किंतु ऐसा होता नहीं है । अपने जीवन साथी से यदि आप नितरोज प्‍यार भरे संबंध बनाते हैं तो आप कई बिमारियों को अनायास ही अपने से दूर भगाने में कामयाब हो जाते हैं ।

इसका दूसरा पहलू भी है वह यह है कि पति-पत्नि के शारीरिक रिस्ते जितने अच्छे होते हैं, उतने ही उनके बीच प्यार और भावनात्मक रिस्ते भी अच्छे रहते हैं। वास्‍तव में देखा जाए तो शारीरिक संबंध एक प्रकार का व्यायाम होता है।

इसके इन फायदों को समझें ....
ब्ल्डप्रैशर कन्ट्रोल- शारीरिक संबंध बनाने से खुन कि परेशानिया कम हो जाती हैं,जिससे खुन का दौरा सामान्य रुप से चलने लगता हैं।

एक्सरसाइज- सारा दिन काम करने के बाद व्यायाम के लिए वक्त निकालना मुश्किल हो जाता हैं,जिसके लिए शारीरिक संबंध बनाना अच्छा व्यायाम हो सकता हैं।

तनाव से रहे दुरी- जिंदगी मे तनाव हो तो जिंदगी बोझ लगने लगती हैं,एेसे में आप अपने पार्टनर के साथ शारीरिक संबंध बनाकर तनाव को कम कर सकते हैं।

दर्द में राहत​- जो अपने पार्टनर के साथ रोजाना शारीरिक संबंध बनाते हैं,उन्हें जोडो के दर्द और बदन दर्द में राहत मिलती हैं।5.औरतों को फायदा; जिन औरतों को

मासिक धर्म और दर्द जैसी परेशानी होती हैं उन महिलाऔं को संबंध बनाने से इन परेशानियों से राहत मिलती हैं।

आरामदायक नींद- शारीरिक संबंध बनाने से शरीर को काफि आराम मिलता हैं,जिससे थकान में राहत मिलती हैं,और नींद अच्छी आती हैं।

इन दिनों समुचे भारत में तेज गर्मी पड़ रही है । रोज गर्मी के कारण लपट से या अन्‍य कारणों से देशभर में लाखों लोग आए दिन बिमार हो रहे हैं, ऐसे में यदि आप चाहते हैं कि बिमार ही न हों तो आपको कुछ सावधानियां बरतने के साथ आवश्‍यक कदम अपने दैनन्‍दिन दिनक्रम में उठाने होंगे ।

इसके लिए पहले लू से बचने के लिए हमें पानी का अधिक से अधिक सेवन करना चाहिए और जब भी घर से बाहर निकले तो हमें अपना हाथ और मुंह कपड़े से जरूर बांध लेना चाहिए । जिससे कि आप लू से पूरे तरह बचे रह सकें । वहीं इन उपायों को अपनाकर भी आप स्‍वस्‍थ रह सकेंगे ।

नींबू
रोजाना गर्मी के दिनों में नींबू पानी का सेवन जरूर करें। इससे आपके शरीर में हुई पानी की कमी पूरी हो जाती है।

कच्चे आम का शर्बत
कच्चे आम का शर्बत पीने से भी गर्मियों में लू से बहुत ज्यादा आराम मिलता है।

पुदीना
पुदीना भी गर्मियों की में आपको काफी ज्यादा राहत देता है। यह आपके पेट में हुई जलन को शांत करता है। और इससे लूं भी नहीं लगती है। इसके अलावा यह पेट में हुई गैस के लिए भी फायदेमंद होता है।

इमली
इमली लू से बचने में हमारी बहुत ज्यादा सहायता करते हैं इसलिए इमली को पानी में कुछ देर भिगो कर रख दें। इसके बाद इसे छान लें। फिर एक गिलास में थोड़ी सी इमली की मात्रा ले। अब इसमें पानी और चीनी मिलाकर इसका सेवन करें।


धनिया
सबसे पहले धनीए को थोड़ी देर के लिए पानी में भिगोकर रख दें। फिर थोड़ी देर बाद धनिया को पानी से निकाल ले। अब इस धनिया को पीस लें और इस में चीनी मिलाकर पिएं।

गूंद कतीरा का शरबत
गूंद कतीरा का शरबत लू से बचने के लिए एक रामबाण इलाज है। गोंद कतीरा की तासीर बहुत ज्यादा ठंडी होती है। इसे रात भर पानी में भिगोकर रखने के बाद चीनी मिले दूध में मिलाकर खाएं। इससे बहुत ज्यादा आराम मिलता है।

प्याज
प्याज भी हमें लू से बचाने के लिए बहुत ज्यादा फायदेमंद होता है। रोज खाने में कच्चे प्याज को सलाद के रूप में ही जरूर खाएं। ऐसा करने से आप लू से बच सकते हैं।

 

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